देहरादून अब उत्तराखंड की राजधानी से अधिक जाम की राजधानी बन गया है। शहर में सड़कों पर वाहनों की लंबी कतारें, हॉर्न का शोर और स्थानीय व सैलानियों की परेशानी आम है। राजपुर रोड, मसूरी मार्ग जैसे प्रमुख रास्ते घंटों जाम रहते हैं।

हर साल बढ़ते 50 हजार नए वाहन, अतिक्रमण और कमजोर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था इस समस्या को बढ़ा रही है, जिससे शहरवासियों और पर्यटकों का अनुभव खराब हो रहा है।

देहरादून। प्रदेश की राजधानी दून इन दिनों किसी शहर से ज्यादा एक चलता-फिरता जाम का चैंबर दिखता है। बाहर से चमकते हाईवे, कटे पहाड़, नए एक्सप्रेसवे, सब कुछ तैयार है, लेकिन शहर में कदम रखते ही हालात ऐसे होते हैं कि मानो कोई अदृश्य दीवार हो, जो कहती हो कि ‘दून में आपका स्वागत है… अब जाम में फंसकर अपनी परीक्षा दें।

सप्ताहांत हो, छुट्टियों का दिन हो, या फिर सामान्य दिन, सड़कों पर रेंगती गाड़ियों की लाइनें, हार्न का शोर, सैलानियों की उलझन और स्थानीय लोगों की बेबसी, यह सब मिलकर दून को यातायात जाम की ‘राजधानी’ का तमगा दे रहे हैं। शहरवासी हो या सैलानी, हर किसी की जुबान पर आजकल एक ही लाइन नजर आती है ‘जाम में फंसा हूँ, थोड़ी देर बाद बात करता हूं।’मुख्य सड़कों का हाल यह है कि जिधर देखो उधर पहिए ठहरते हुए नजर आते हैं। सड़कों का हाल ऐसा है कि पुलिस-प्रशासन चाहे जितने बयान दे, हकीकत रोजाना इन सड़कों पर साफ नजर आती है। चौड़ी दिखने वाली शहर की सबसे वीआइपी राजपुर रोड पर सुबह 10 बजे से रात नौ बजे तक स्थिति एक जैसी नजर आती है।

इस सड़क पर दिनभर गाड़ियां रेंगती है, आफिस टाइम में समय पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। ट्रैफिक सिग्नलों से पहले लंबी कतारें और दोनों तरफ अतिक्रमण ने इसकी सांसें बंद कर रखी हैं। यही हाल कौलागढ़-बल्लीवाला–आइएसबीटी कारिडोर का भी है।

यह इलाका अब ट्रैफिक का डरावना तिकोन बन चुका है। जीएमएस रोड पर पर जाम, बल्लूपुर चौक और कमला पैलेस तिराहे पर वाहन ऐसे फंसते हैं कि बिना यातायात पुलिस के निकलना मुश्किल हो जाता है।

आइएसबीटी के आसपास स्थिति और बिगड़त जाती है। अनियंत्रित आटो-विक्रम व ई-रिक्शा, अवैध पार्किंग व बसों का प्रतिबंध के बावजूद सड़क पर खड़े रहना, अब यहां की नियति बन चुका है। सहस्रधारा-रायपुर रोड व परेड ग्राउंड मार्ग के हालात भी सुबह-शाम ऐसे हैं कि किसी भी मोड़ पर 15 मिनट रुकना आम बात बन चुकी है।

वहीं, घंटाघर-चकराता रोड-प्रेमनगर मार्ग की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात सड़क चौड़ी न होना, पर वाहन तेजी से बढ़ना है। पीक टाइम में यहां एक किमी का सफर 30 से 40 मिनट में पूरा होता है। हरिद्वार बाईपास-जोगीवाला पर चमकती नेशनल हाईवे की रफ्तार जैसे ही शहर की सीमा छूती है, वाहन मानो लोहे की जंजीरों में जकड़कर रुक जाते हैं।

मसूरी मार्ग, पीक सीजन में हर मोड़ पर जाम

मसूरी मार्ग दून का सबसे ज्यादा दबाव झेलने वाला मार्ग बन गया है। सप्ताहांत, त्योहारों या छुट्टियों के दौरान तो इस सड़क पर हालात ऐसे बन जाते हैं कि गाड़ियों की कतारें कई-कई किलोमीटर लंबी दिखाई देती हैं। दून से ‘क्वीन आफ हिल्स’ तक का सफर जो सामान्य दिनों में 40-50 मिनट का होता है, जाम के दौरान तीन से चार घंटे तक खिंच जाता है।लाइब्रेरी चौक, हाथीपांव, भट्टाफाल, मैगी प्वाइंट और मसूरी डायवर्जन के समीप तो गाड़ियां इंच-इंच बढ़ती हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत तब होती है जब किसी एक मोड़ पर कोई वाहन खराब हो जाए। पहाड़ की ढलानों तक परतों की तरह गाड़ियां चढ़ जाती हैं।

सुबह से शाम तक सड़क पर ऐसा दबाव बना रहता है कि घर से निकलने से पहले लोग जाम का अनुमान लगाकर काम तय करते हैं। सैलानियों में निराशा व शहरवासियों में थकान। मसूरी मार्ग दून की ट्रैफिक पीड़ा का सबसे बड़ा आइना बन चुका है।

सैलानी बोल रहे, ‘सड़कें कहां हैं? बस जाम ही जाम दिखता है’

दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद, मेरठ, पानीपत, पंजाब और उत्तर प्रदेश के शहरों से दून-मसूरी आने वाले सैलानी अक्सर यही सवाल करते नजर आते हैं कि ‘हम हाईवे से जो तेज आ गए, पर शहर में कौन सा रास्ता लें?’ सैलानियों और शहरवासियों का दर्द अब देहरादून की सड़कों पर खुलकर दिखने लगा है।

बाहर से एक्सप्रेसवे की रफ्तार पकड़कर आने वाले पर्यटक शहर में कदम रखते ही खुद को जाम के ऐसे जाल में फंसा पाते हैं, जहां गाड़ियों की लंबी कतारें, धूप में तपते चेहरे और मिनट-मिनट का बढ़ता तनाव उनकी यात्रा का मजा खराब कर देता है।

मसूरी पहुंचने का उत्साह तब फीका पड़ जाता है, जब राजपुर रोड या जीएमएस रोड-बल्लीवाला चौक की ओर बढ़ते हुए सड़कें टस से मस नहीं होतीं। शहर के लोगों की पीड़ा भी इससे अलग नहीं। सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ने में जितना समय लगता है,

उतना कुछ साल पहले दून से हरिद्वार पहुंचने में लगता था। वहीं, दुकान खोलने से लेकर अस्पताल तक पहुंचने तक हर काम का पहला ‘शत्रु’ जाम ही बन गया है। लोगों का कहना है, ‘जिंदगी की रफ्तार नहीं, अब जाम की रफ्तार तय करती है कि हम दिन भर क्या कर पाएंगे।’

प्रशासन की योजनाएं: कागज मजबूत, जमीन पर कमजोर

मल्टीलेवल पार्किंग, स्मार्ट सिग्नलिंग का दावा, विक्रम-आटो व ई-रिक्शा रूट के पुनर्गठन की बातें, सब सुनाई ज्यादा देते हैं, दिखते कम। शहर के दबाव वाले रूटों पर ना ट्रैफिक मैनेजमेंट दिखता, ना ही रोड़ इंजीनियरिंग।

दून आज हालात की उस दहलीज पर खड़ा है, जहां बाहर से आने वाला हर मेहमान कह रहा कि ‘राजधानी में आकर राजधानी जैसी सुविधा तो दूर, चलना भी मुश्किल है।’ जबकि, शहरवासी कह रहे ‘यातायात नहीं, अब तो जाम ही देहरादून की पहचान बन गया है।’ शहर बढ़ा, पर सड़कें नहीं बढ़ पाई।

हर साल 50 हजार नए वाहन, पर पार्किंग सिर्फ नाम की।

हर रोड पर कम से कम 20–25 प्रतिशत हिस्सा अतिक्रमण में घिरा।

30 साल पुराने नकाशों पर चल रहा दून, नई कालोनी, नए अपार्टमेंट, नई आबादी, पर सड़कें वही।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट की रीढ़ कमजोर, लोग मजबूरी में निजी वाहन बढ़ाते जा रहे।

पर्यटकों का दबाव शहर झेल ही नहीं पा रहा, कोई इनफ्लो-आउटफ्लो सिस्टम नहीं।

नतीजा, हाईवे झिलमिलाते रहे, पर शहर की रफ्तार घुटनों पर आ गई।

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